पोड़ी उपरोड़ा कस्तूरबा छात्रावास की बच्चियां रात 8.30 बजे अंधेरे में ढाई सौ मीटर दूर से ला रही थी पानी, जिम्मेदारों पर उठे सवाल, बिजली बाधित के कारण हुई समस्या
पोड़ी उपरोड़ा :- आज रात करीब साढ़े 8 बजे एक चौंका देने वाली तस्वीर सामने आई जब पोड़ी उपरोड़ा के कस्तूरबा गांधी बालिका छात्रावास की छात्राएं रात के अंधेरे में ढाई सौ मीटर दूर हैंडपंप से पानी लाते हुए देखी गईं। यह स्थिति तब उत्पन्न हुई जब पूरे दिन क्षेत्र में बिजली नहीं होने के कारण छात्रावास में पानी की भारी किल्लत हो गई। छात्रावास परिसर के बोरवेल पंप नहीं चल पाए और पूरे दिन छात्राओं को पीने तक का पानी नसीब नहीं हुआ।
स्थानीय निवासी श्यामेंद्र आर्मो ने बताया कि बच्चियों को इस तरह रात के अंधेरे में पानी ले जाते देख कर वे दंग रह गए और तुरंत ग्राम सरपंच एवं जनप्रतिनिधियों को सूचना दी। सरपंच और विधायक प्रतिनिधि सहेत्तर सिंह राज मौके पर पहुंचे और छात्राओं से बातचीत की। उन्होंने बताया कि करीब 15-20 बच्चियां अपने लिए पानी लेने गई थीं क्योंकि छात्रावास में पानी पूरी तरह समाप्त हो चुका था। छात्राओं ने बताया कि बिजली नहीं होने के कारण बोरिंग का मोटर नहीं चल पाया और पूरे दिन पानी नहीं मिला, जिससे उन्हें मजबूरन बाहर जाकर पानी लाना पड़ा। छात्राओं ने अपनी जिम्मेदारी लेते हुए कहा कि वे अपने पीने के लिए पानी ले जा रही थीं।
दिन भर बिजली नहीं आने कि वजह से हुई समस्या
हालांकि यह परेशानी क्षेत्र मे दिन भर बिजली नहीं होने कि वजह से हुई और आश्रम में दिनभर बिजली नहीं रहने के कारण जल आपूर्ति बाधित हो गई, जिससे बालिकाओं को भारी कठिनाईयों का सामना करना पड़ा। पानी की व्यवस्था न होने के कारण छात्राओं को लगभग ढाई सौ मीटर दूर से स्वयं पानी लाना पड़ा। बिजली की आपूर्ति बाधित होने के बाद आश्रम प्रबंधन ने लगातार बिजली विभाग से संपर्क कर स्थिति की जानकारी लेनी चाही, लेकिन उन्हें बिजली आने के समय की स्पष्ट जानकारी नहीं दी गई। अंततः रात करीब 8:45 बजे बिजली आई, लेकिन तब तक छात्राएं दिनभर पानी की किल्लत से परेशान रहीं। इस घटना ने प्रशासन और प्रबंधन की तैयारियों पर सवाल खड़े कर दिए हैं। बच्चों से पानी जैसे बुनियादी जरूरतों को खुद जाकर लाने की उम्मीद करना न केवल अनुचित है, बल्कि यह उनकी सुरक्षा और स्वास्थ्य के लिए भी चिंताजनक है।
प्रशासनिक लापरवाही या व्यवस्थागत विफलता?
यह घटना कस्तूरबा छात्रावास की व्यवस्थाओं पर कई गंभीर सवाल खड़े करती है। आश्रम की अधीक्षिका की जिम्मेदारी क्या केवल बच्चों को खुद पर छोड़ देना है? क्या छात्राओं की सुरक्षा की कोई चिंता नहीं? आदिवासी अंचल से अपने बच्चों को पढ़ाई के लिए भेजने वाले अभिभावकों के मन में अब सवाल उठ रहे हैं कि क्या वाकई उनके बच्चे छात्रावास में सुरक्षित हैं?स्थानीय जनप्रतिनिधियों का मानना है कि यदि अधीक्षिका समय रहते प्रशासन या पंचायत से मदद मांगती, तो पानी की वैकल्पिक व्यवस्था की जा सकती थी। लेकिन लापरवाही के चलते बच्चियों को खुद अपने लिए पानी की व्यवस्था करनी पड़ी, वह भी रात के अंधेरे में।
फिलहाल प्रशासन और जनप्रतिनिधियों ने मामले की गंभीरता को देखते हुए समाधान का आश्वासन दिया है। वहीं, ग्रामीणों की मांग है कि छात्रावास में वैकल्पिक जल आपूर्ति व्यवस्था की जाए ताकि भविष्य में ऐसी स्थिति फिर उत्पन्न न हो। इस घटना ने यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि जब बेटियों कों पढ़ाई के समय कभी मूलभूत सुविधाओ के लिए तरसना पड़ जाए तो शिक्षा का सपना कैसे साकार होगा?

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