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कटघोरा अस्पताल में लापरवाही की पराकाष्ठा उजागर: दुष्कर्म पीड़िता बच्ची घंटों इंतजार करती रही, डॉक्टर ने ड्यूटी खत्म होने का दिया हवाला

कटघोरा अस्पताल में लापरवाही की पराकाष्ठा उजागर: दुष्कर्म पीड़िता बच्ची घंटों इंतजार करती रही, डॉक्टर ने ड्यूटी खत्म होने का दिया हवाला

कोरबा /कटघोरा:- कोरबा जिले मेँ एक बार फिर संवेदनशील मामले में सरकारी तंत्र की गंभीर लापरवाही सामने आई है। एक नाबालिग बच्ची के साथ दुष्कर्म की वारदात के बाद जब पुलिस उसे मुलाहिजा (मेडिकल परीक्षण) के लिए लेकर अस्पताल पहुंची, तो डॉक्टर द्वारा ड्यूटी समय का हवाला देते हुए परीक्षण से इनकार कर दिया गया।

प्राप्त जानकारी के अनुसार, कोरबी चौकी क्षेत्र में नाबालिग बच्ची के साथ दुष्कर्म का मामला प्रकाश में आया है। इस मामले में कार्रवाई करते हुए पुलिस ने बच्ची को मेडिकल परीक्षण के लिए पोड़ी उपरोड़ा के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र ले जाया, लेकिन वहां महिला डॉक्टर की अनुपस्थिति के कारण उन्हें कटघोरा सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र भेजा गया। पुलिस जब दोपहर लगभग 12:45 बजे कटघोरा अस्पताल पहुंची, तो वहां मौजूद महिला डॉक्टर ने मुलाहिजा करने में असमर्थता जताते हुए कहा कि मेडिकल परीक्षण में दो घंटे से अधिक का समय लग सकता है, जबकि उनकी ड्यूटी दोपहर 2 बजे समाप्त हो रही है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि वे परीक्षण नहीं करेंगी और यह कार्य आने वाले डॉक्टर द्वारा किया जाएगा। यह रवैया सिर्फ एक नाबालिग पीड़िता के साथ अन्याय नहीं है, बल्कि यह स्वास्थ्य विभाग की संवेदनहीनता और गैर-जिम्मेदारी को भी उजागर करता है। संवेदनशील मामलों में समय पर मेडिकल परीक्षण पीड़िता के न्याय के लिए आवश्यक होता है, लेकिन डॉक्टर द्वारा ड्यूटी समय का हवाला देकर परीक्षण से इनकार करना व्यवस्था की गंभीर खामी को दर्शाता है।

घंटों तक पीड़िता अस्पताल परिसर में इंतजार करती रही, जिससे उसकी मानसिक पीड़ा और अधिक बढ़ती गई। इस दौरान पुलिसकर्मियों की भी असहायता झलक रही थी, क्योंकि मेडिकल सहयोग के अभाव में उनके प्रयास भी अधूरे रह गए। इस मामले ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या सरकारी डॉक्टर सिर्फ अपनी ड्यूटी की सीमाओं तक ही सीमित हैं? क्या संवेदनशील मामलों में मानवीय मूल्यों और सामाजिक कर्तव्यों की कोई भूमिका नहीं रह गई है। हालांकि इस पूरे प्रकरण पर स्वास्थ्य विभाग की ओर से कोई स्पष्ट बयान अब तक सामने नहीं आया है। सवाल यह भी उठता है कि क्या ऐसे डॉक्टरों पर कोई कार्रवाई होगी जो पीड़िता की हालत समझने के बजाय अपनी ड्यूटी का बहाना बनाकर संवेदनशील मामलों से मुंह मोड़ते हैं?

दुष्कर्म जैसे मामलों में समय पर मेडिकल परीक्षण कानूनी दृष्टिकोण से भी अत्यंत आवश्यक होता है। देर से किया गया परीक्षण न केवल साक्ष्यों को प्रभावित कर सकता है, बल्कि न्याय प्रक्रिया में भी बाधा उत्पन्न करता है। यह घटना सिर्फ प्रशासनिक लापरवाही का उदाहरण नहीं है, बल्कि यह भी दर्शाती है कि जब समाज को संवेदनशीलता की सबसे ज्यादा ज़रूरत होती है, तब हमारे सिस्टम के ज़िम्मेदार लोग अपने कर्तव्यों से पीछे हट जाते हैं। अब देखना यह है कि प्रशासन इस मामले को कितनी गंभीरता से लेता है और लापरवाह डॉक्टर के खिलाफ क्या कार्रवाई होती है। साथ ही यह घटना स्वास्थ्य विभाग को संवेदनशील मामलों में अपनी नीति और व्यवस्था को पुनः समीक्षा करने पर भी मजबूर करती है।

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