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गुरसिया लोकेशन में 108 एम्बुलेंस सेवा बंद: डिलीवरी जैसे संवेदनशील मामलों में 112 बन रही मजबूरी, अनहोनी की जिम्मेदारी कौन लेगा?

गुरसिया लोकेशन में 108 एम्बुलेंस सेवा बंद: डिलीवरी जैसे संवेदनशील मामलों में 112 बन रही मजबूरी, अनहोनी की जिम्मेदारी कौन लेगा?

कोरबा / पोड़ी उपरोड़ा :- आदिवासी बाहुल्य और दूरस्थ क्षेत्र जिले के पोड़ी उपरोड़ा विकास खंड में स्वास्थ्य सेवाओं की लचर व्यवस्था का एक और उदाहरण सामने आया है, जहाँ 108 एम्बुलेंस सेवा महीनों से बंद पड़ी है। इसका नतीजा यह है कि अब डिलीवरी जैसे अति संवेदनशील केस भी 112 इमरजेंसी रिस्पॉन्स व्हीकल (ईआरव्ही) से निपटाए जा रहे हैं, जबकि 112 सेवा में न डॉक्टर होते हैं, न प्राथमिक उपचार की सुविधा।

ताजा मामला पोड़ी विकास खंड कोरबी चौकी क्षेत्र के ग्राम कुरथा से सामने आया, जहाँ प्रसव पीड़ा से जूझ रही 29 वर्षीय श्रीमती बिंदेश्वरी को 112 की मदद से अस्पताल ले जाया जा रहा था, लेकिन रास्ते में ही महिला ने 112 वाहन में बच्चे को जन्म दे दिया। सौभाग्यवश मितानिन मौजूद थी, जिससे डिलीवरी सुरक्षित हो सकी। सोचने वाली बात यह है कि यदि मितानिन साथ न होती, तो किसी अनहोनी की स्थिति में जिम्मेदार कौन होता?

दरसल शासन द्वारा 108, 102, 112 जैसी कई निशुल्क वाहन सेवाएं ग्रामीणों को उपलब्ध कराई गई हैं। 108 सेवा विशेष रूप से गंभीर और मेडिकल इमरजेंसी के लिए होती है, लेकिन पोड़ी उपरोड़ा गुरसिया लोकेशन में इसकी अनुपलब्धता के कारण मरीजों को या तो 112 के भरोसे छोड़ दिया जा रहा है या खुद के साधनों से अस्पताल पहुंचने की मजबूरी हो रही है। पोड़ी उपरोड़ा विकासखंड में वर्तमान में केवल दो 108 वाहन – जटगा और पसान – में संचालित हो रहे हैं, जबकि क्षेत्र में महतारी एक्सप्रेस (102) की संख्या अपेक्षाकृत बेहतर है। इसके बावजूद गुरसिया जैसे सुदूर गांवों में इन सेवाओं की समय पर उपलब्धता नहीं हो पा रही है। इससे पहले भी पोड़ी उपरोड़ा गुरसिया में 108 एम्बुलेंस की कमी को लेकर रिपोर्ट प्रकाशित की जा चुकी है। कुछ समय के लिए सेवा शुरू भी हुई, लेकिन फिर से वही हालात लौट आए। प्रशासनिक रिकॉर्ड में तो सब कुछ ‘ठीक’ दिखाया जाता है, लेकिन ज़मीनी सच्चाई कुछ और है।

जरूरत है कि शासन इस मुद्दे को गंभीरता से ले और पोड़ी उपरोड़ा गुरसिया जैसे क्षेत्रों में 108 एम्बुलेंस सेवा को तत्काल पुनः सक्रिय किया जाए, ताकि गरीब और दूरदराज के मरीजों को समय पर सही इलाज मिल सके, और संवेदनशील मामलों में 112 जैसे सीमित संसाधनों पर निर्भर न रहना पड़े।

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