फर्जी खातों की कूट रचना से सैकड़ों को मिली नौकरी, अब भी SECL में कार्यरत — प्रशासनिक उदासीनता से न्याय अधर में
कोरबा SECL :- छत्तीसगढ़ के कोरबा जिले में एक बड़े जमीन घोटाले और फर्जी नियुक्तियों का मामला सामने आया है, जो पिछले दो दशकों से न्याय की राह देख रहा है। यह मामला राजस्व विभाग की मिलीभगत और दस्तावेजी कूट रचना का ऐसा उदाहरण है, जिसमें शासकीय भूमि को कागज़ों में निजी दिखाकर सैकड़ों लोगों को फर्जी रूप से नौकरी दिलाई गई — और आज भी वे सभी SECL (साउथ ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड) जैसे प्रतिष्ठित सार्वजनिक उपक्रम में कार्यरत हैं।
जानिए पूरा मामला क्या है?
थाना कटघोरा, जिला कोरबा में वर्ष 1996 में अपराध क्रमांक 239/96 पंजीबद्ध किया गया था। इसके तहत भारतीय दंड संहिता की धाराएं 420 (धोखाधड़ी), 423 (झूठे दस्तावेज बनाना), 466, 467, 468, 471 (दस्तावेजों की कूट रचना और उनका उपयोग) लगाई गईं। प्राथमिक जांच में सामने आया कि ग्राम पंचायत ढेलवाडीह, प.ह.नं. 42 की शासकीय भूमि — खसरा नंबर 310/1 क और 315/1 क, जो जंगल चराई मद में दर्ज थी जिसे वर्ष 1989-90 से 1994-95 के बीच तत्कालीन पटवारी सुंदरलाल एवं बुधराम साव द्वारा कूट रचना कर निजी खातों में दर्शाया गया। 89 फर्जी खातों के जरिए 6.94 एकड़ भूमि और 112 खातों में 27.75 एकड़ भूमि को अवैध रूप से विभाजित कर नामांतरण करवाया गया। इस साजिश में राजस्व निरीक्षक आरबी चंद्रा की भूमिका भी उजागर हुई, जिन्होंने बिना वैध दस्तावेजों के नामांतरण को प्रमाणित किया। यही फर्जी खातेदार, इन अवैध दस्तावेजों के आधार पर SECL में नौकरी पाने में सफल रहे।
प्रशासन की भूमिका: जांच आगे क्यों नहीं बढ़ी आगे
पूर्व SDM कटघोरा की सतर्कता से इस मामले की शुरुआत तो हुई और केस दर्ज भी कराया गया, लेकिन इसके बाद जांच में ठहराव आ गया। राज्य शासन द्वारा अभियोजन की स्वीकृति तो दी गई, लेकिन सिर्फ कुछ आरोपियों पर ही कार्रवाई हो पाई। 69 कर्मचारियों ने समय रहते न्यायालय में केस लड़ा और तकनीकी आधार पर बरी हो गए, क्योंकि 90 दिनों में राज्य द्वारा कोई अपील नहीं की गई। ये सभी आज भी SECL में कार्यरत हैं। वहीं बाकी बचे लगभग 181 लोगों के खिलाफ न कोई मुकदमा दायर हुआ, न गिरफ्तारी हुई, और वे "कानूनन फरार" घोषित होने के बावजूद भी सेवा में बने हुए हैं।
यह सिर्फ घोटाला नहीं, व्यवस्था पर सवाल है
इस मामले में दो दशक से अधिक का समय बीत गया, लेकिन न्याय और प्रशासनिक जवाबदेही का अब तक कोई स्पष्ट मार्ग नहीं निकला है। यह केवल एक भ्रष्टाचार का मामला नहीं, बल्कि शासन, पुलिस प्रशासन, और न्याय प्रणाली की सामूहिक निष्क्रियता का प्रतीक है। आज जब सरकारी नौकरियों की मांग और प्रतिस्पर्धा चरम पर है, ऐसे में यह प्रकरण उन योग्य उम्मीदवारों के साथ भी अन्याय है, जिनकी नियुक्ति इन फर्जी खातों और कागजी हेरफेर की वजह से नहीं हो पाई।
अब यह जरूरी हो गया है कि राज्य शासन और केंद्रीय कोयला मंत्रालय इस पूरे प्रकरण की पुनः जांच कराएं। जिन कर्मचारियों ने फर्जी दस्तावेजों के आधार पर नौकरी प्राप्त की है, उनकी सेवाओं की समीक्षा हो, और दोषियों पर सख्त कार्रवाई हो। साथ ही, जिन प्रशासनिक अधिकारियों ने जांच को रोका या देरी की, उनकी भूमिका की भी जांच होना चाहिए।

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