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नक्सलवाद की शुरुआत से अब तक की कहानी

 तेलंगाना के गांवों में भले ही हंसिया-हथौड़े वाले पुराने स्मारक आज भी सड़कों के किनारे दिख जाते हैं. लेकिन अब दलित बस्तियों में चौक-चौराहों पर बी. आर आंबेडकर की प्रतिमा ज़्यादा दिखती है, इसके अलावा कहीं-कहीं शिवाजी और विवेकानंद की नई-नई लगी मूर्तियां भी दिखने लगी हैं. ये दिखाता है कि यहां अलग-अलग विचारधारा अपने प्रतीक चिह्नों और संकेतों के साथ अपनी पैठ बनाने के लिए संघर्षरत हैं.

आंबेडकरवादी विचारधारा का प्रतीक, नीला रंग, 1990 के दशक से ही वामपंथी प्रतीक लाल रंग को पीछे छोड़ रहा है. शिवाजी और विवेकानंद की मूर्तियों का पूरे तेलंगाना में दिखना अपेक्षाकृत नई तस्वीर है. इनमें से अधिकांश मूर्तियां उभरती हिंदुत्ववादी ताक़तों ने स्थापित की हैं.



1990 का दशक ख़त्म होते-होते तेलंगाना में सशस्त्र संघर्ष लगभग समाप्त हो गया था. हालांकि, बस्तर में मौजूद शीर्ष माओवादी नेतृत्व फिर भी तेलुगु बोलने वालों के नियंत्रण में ही रहा.


केंद्रीय अर्धसैनिक बलों के सामने 31 मार्च 2026 तक नक्सलवाद को पूरी तरह ख़त्म करने का लक्ष्य रखा गया है. यह समय-सीमा केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने तय की है.


छत्तीसगढ़ के जंगलों में नक्सलियों के साथ मुठभेड़ की जैसी रिपोर्ट्स आ रही हैं, उससे यह संकेत मिलता है कि माओवादी आंदोलन अपने आख़िरी दौर में है.


ऐसा दिखता है कि अब माओवादी भी इस बात को समझ चुके हैं. प्रवक्ता अभय का 'हथियार डालने' वाला पत्र और नेता रूपेश का भविष्य के प्रति अनिश्चय को स्वीकार करना यही दिखाता है. क्या सशस्त्र आंदोलन के दिन समाप्त हो गए हैं? 

,,,,,नक्सलबाड़ी से श्रीकाकुलम तक.

नक्सलवाद की चिंगारी साल 1967 में पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी से भड़की थी. सिलीगुड़ी में सीपीआई(एम) के कट्टरपंथी धड़ों ने जमींदारों के ख़िलाफ़, कर्ज में डूबे आदिवासियों और भूमिहीन किसानों के साथ मिलकर अभियान शुरू किया. 25 मई को पुलिस के एक सब-इंस्पेक्टर की तीर-कमान से हत्या कर दी गई. पुलिस की गोलीबारी में आठ महिलाओं, दो बच्चों और एक पुरुष की मौत हुई. इसके साथ ही सशस्त्र संघर्ष फैलना शुरू हुआ और चीन की मीडिया ने इसे 'स्प्रिंग थंडर ओवर इंडिया' करार दिया. 

... हंग्री सिक्सटीज़.....

यह आंदोलन भले ही स्थानीय मुद्दों से जुड़ा हुआ था, लेकिन इसका राजनीतिक लक्ष्य कहीं बड़ा था: चीन के उदाहरण को ध्यान में रखते हुए सशस्त्र क्रांति के ज़रिए सत्ता पर क़ब्ज़ा करना. सीपीआई(एम) के रेडिकल धड़े ने अपना आधार बढ़ाने के लिए आदिवासियों की शिकायतों पर ध्यान केंद्रित किया.


साल 1969 की केंद्र सरकार की एक रिपोर्ट में कहा गया: "इस अशांति का मूल कारण आदिवासियों के हितों की रक्षा के लिए बनाए गए कानूनों का सही तरीके से लागू नहीं होना है और जब तक इस पर ध्यान नहीं दिया जाता, तब तक उन आदिवासियों का भरोसा जीतना संभव नहीं होगा, जिनका नेतृत्व चरमपंथियों ने अपने हाथों में ले लिया है."


इतिहासकार सुमंत बनर्जी ने 'हंग्री सिक्सटीज़' की व्याख्या की है. उनका कहना है कि सूखा संकट, मुद्रा अवमूल्यन, मंदी ने उग्रवाद के लिए उपजाऊ ज़मीन तैयार की और वैश्विक तौर पर भी देखें तो 1960 का दशक आंदोलनों का दशक था.


इससे दो साल पहले एक स्थानीय सीपीआई(एम) नेता चारु मजूमदार ने गुरिल्ला युद्ध के जरिए इंडियन स्टेट को उखाड़ फेंकने के मक़सद के साथ 'आठ दस्तावेज' तैयार किए. कानू सान्याल और जंगल संथाल के साथ मिलकर उन्होंने शुरुआत में नक्सलबाड़ी आंदोलन का नेतृत्व किया. यह आंदोलन बाद में श्रीकाकुलम, तेलंगाना, बिहार समेत दंडकारण्य के जंगलों तक फैल गया. 



...सशस्त्र आंदोलन बनाम संसदीय रास्ता

सशस्त्र संघर्ष पर बहस नक्सलबाड़ी से पहले ही शुरू हो चुकी थी. ‘तेलंगाना किसान सशस्त्र संघर्ष’ के दौर की ‘आंध्रा थीसिस’ 1960 के दशक तक जारी रही. 1951 में सीपीआई की रणनीतिक लाइन ने ग्रामीण ‘पार्टिसन वॉर’ को शहरी हड़तालों के साथ जोड़ने का आह्वान किया था.

सीपीआई(एम) के सह-संस्थापक पुचालापल्ली सुंदरैया ने आपातकाल के दौरान आरएसएस के साथ सहयोग के विरोध में और 1951 की रणनीतिक लाइन में तय ‘पार्टिसन वॉर’ पर प्रगति न होने व पार्टी का गुप्त विंग बनाने में असफल रहने के कारण अपने पदों से इस्तीफ़ा दे दिया था. सुंदरैया, मकनेनी बसवपुन्नैया और बी.टी. रणदीवे के बीच भूमिगत काम और हिंसक रास्ते को लेकर मतभेद थे. बाद में सीपीआई(एम) ने मकनेनी बसवपुन्नैया के नेतृत्व में अपनी नीति में संशोधन करते हुए शांतिपूर्ण रास्ता अपनाया.

साल 1964 में सीपीआई में टूट हुई, जिसके बाद सीपीआई(एम) अस्तित्व में आया. यह विभाजन मुख्य तौर पर इस बात को लेकर हुआ था कि सोवियत यूनियन का अनुकरण किया जाए या फिर चीन का. वहीं, सशस्त्र संघर्ष को विकल्प मानने वाले असंतुष्ट नेताओं ने ऑल इंडिया कोऑर्डिनेशन कमेटी ऑफ कम्युनिस्ट रिवॉल्यूशनरीज़ (एआईसीसीसीआर) बनाई, जो साल 1969 में सीपीआई(एमएल) बन गई. 

सोवियत यूनियन से चीन तक...

1960 के दशक के अंत में सोवियत यूनियन का प्रभाव कम होता चला गया. साल 1951 में स्टालिन से मिलने के बाद तेलंगाना का सशस्त्र संघर्ष ख़त्म करने का निर्णय लिया गया था. इसी बीच चीन में 1949 में हुई क्रांति ने रेडिकल्स को प्रेरित किया. माओ भारतीय रेडिकल्स के लिए एक जुट होने वाली ताकत बन गए और उनका प्रभाव इतना हो गया कि चारु मजूमदार ने यहां तक कह दिया कि, 'चीन का चेयरमैन हमारा चेयरमैन है.'


कोलकाता का प्रेसिडेंसी कॉलेज नक्सल हब हुआ करता था, जो मध्यम वर्ग के युवाओं को अपनी ओर खींचता था. यहां तक कि दिल्ली के सेंट स्टीफंस जैसे इलिट कॉलेज के स्टूडेंट्स भी किसानों को एकजुट करने के लिए गांव तक पहुंच गए. पश्चिम बंगाल में सीपीआई और सीपीआई(एम) की भागीदारी वाली संयुक्त मोर्चा सरकार, और बाद में कांग्रेस ने भूमि सुधारों और कठोर पुलिस कार्रवाई दोनों से जवाब दिया.


साल 1964 में सीपीआई में टूट हुई, जिसके बाद सीपीआई(एम) अस्तित्व में आया. यह विभाजन मुख्य तौर पर इस बात को लेकर हुआ था कि सोवियत यूनियन का अनुकरण किया जाए या फिर चीन का. वहीं, सशस्त्र संघर्ष को विकल्प मानने वाले असंतुष्ट नेताओं ने ऑल इंडिया कोऑर्डिनेशन कमेटी ऑफ कम्युनिस्ट रिवॉल्यूशनरीज़ (एआईसीसीसीआर) बनाई, जो साल 1969 में सीपीआई(एमएल) बन गई. 


....पीपल्स वॉर और एमसीसी का जन्म....

अक्तूबर 1977 में कोंडापल्ली सीतारमैया के नेतृत्व में रेडिकल स्टूडेंट्स यूनियन और रेडिकल यूथ लीग की स्थापना हुई. 22 अप्रैल 1980 को लेनिन के जन्मदिन पर उन्होंने और उनके साथियों ने आंध्र प्रदेश में सीपीआई(एमएल) पीपुल्स वॉर का गठन किया, जबकि कनाई चटर्जी का बिहार ग्रुप बाद में माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर (एमसीसी) बना.


दोनों ने ही संसदीय राजनीति को ख़ारिज कर दिया और तत्काल सशस्त्र अभियान का आह्वान किया और भूमिगत संगठन बनाने पर ज़ोर दिया.


उन्होंने दलित और आदिवासी का मज़बूत आधार तैयार किया और कोबाड गांधी जैसे शिक्षित मध्यमवर्गीय लोगों को भी आकर्षित किया.


उन्होंने भूमि के पुनर्वितरण, बंधुआ मज़दूरी को ख़त्म करने, वन उत्पादों के उचित दाम, और ‘शोषण करने वाले टैक्स’ के अंत के लिए लड़ाई लड़ी. 


.....तेलंगाना से दंडकारण्य....


सीतारमैया ने आधार तैयार करने के लिए दंडकारण्य में काडर भेजे. माओवादियों ने आधुनिक खेती सिखाई, शोषण का विरोध किया और आदिवासियों का भरोसा जीता. पिनाका पाणि की ‘जनतानाराज्यम दंडकारण्यम’ में लिखा है कि 1980 के दशक में बस्तर में मज़दूरी का भुगतान और आधुनिक तरीके से धान की खेती का अता-पता नहीं था. भोजन में सब्ज़ियाँ केवल साग तक सीमित थीं और दूसरी फ़सल उगाने का कोई चलन नहीं था. माओवादी नई तकनीक लेकर आए. उन्होंने सहकारी समितियाँ बनाई. स्कूल, तालाब और कुएं बनवाए.


तेलंंगाना का वारंगल रीजनल इंजीनियरिंग कॉलेज (अभी एनआईटी) एक तरह से भर्ती का केंद्र बन गया था और इसी वजह से इस कॉलेज को 'रेडिकल इंजीनियरिंग कॉलेज' कहा जाने लगा. सीपीआई(माओवादी) महासचिव नंबाला केशव राव समेत कई लोग यहां माओवादी आंदोलन से जुड़े.


1980 के दशक में, नक्सलियों के नेतृत्व में भूमिहीन किसानों ने ज़मींदारों की ज़मीनें जब्त कीं, जिसके कारण सरकार ने कई क्षेत्रों को “अशांत” घोषित कर दिया.


निज़ाम के शासन के बाद भी तेलंगाना में सामंतवादी प्रभुत्व जारी रहा. बंधुआ मज़दूरी, हिंसक ज़मींदार, पेत्तमदारी और अन्य शोषणकारी व्यवस्था बनी रही. रोज़गार के मौके कम थे और व्यापक रूप से लोगों में निराशा फैली हुई थी. यही वह समय था जब “एंग्री यंग मैन” का उदय फ़िल्मी पर्दे और असली जीवन में भी हो रहा था. गांवों में एक निर्दयी ज़मींदार के ख़िलाफ़ शोषित जनता एकजुट हो रही थी और इन सब चीजों ने मिलकर सशस्त्र उग्रवाद के लिए उपजाऊ ज़मीन तैयार की.


नक्सलियों का प्रभाव भूमि संघर्षों के माध्यम से बढ़ता गया, वे ज़मींदारों की संपत्तियों पर कब्ज़ा करते और उन्हें भूमिहीनों में बांट देते. हालांकि, अक्सर ये कब्ज़ाई गई ज़मीनें बेकार पड़ी रहतीं, क्योंकि सरकार उन्हें अवैध मानकर भूमिहीनों को खेती करने की अनुमति नहीं देती थी.


सामाजिक वैज्ञानिकों ने नोट किया कि नक्सली, एक दबाव बनाने वाले ग्रुप के तौर पर भी काम कर रहे थे और इसकी वजह से आदिवासियों और दलितों के हित में उन्होंने कई प्रगतिशील क़ानून लागू कराने के रास्ते तैयार किए प्रसिद्ध मानवाधिकार कार्यकर्ता, वकील और पूर्व नक्सल समर्थक के. बालगोपाल के अनुसार- “बेगार की समाप्ति और न्यूनतम वेतन के क़रीब भुगतान-ये दो ऐसे अहम बदलाव हैं जो माओवादी आंदोलन के दबाव की वजह से हो पाया."

..धीरे-धीरे बदलाव...

सोवियत संघ के विघटन और पूर्वी यूरोप में हुए परिवर्तनों के साथ, मार्क्सवाद का आकर्षण काफ़ी हद तक कम हो गया और एक विचारधारा के रूप में उस पर सवाल उठने लगे. 1990 के दशक में वैश्वीकरण ने सामाजिक और आर्थिक ढांचे को बदल दिया. आंध्र प्रदेश में आईटी बूम, वाई.एस. राजशेखर रेड्डी की फ़ीस रीइम्बर्समेंट योजना और बढ़ती कल्याणकारी योजनाओं ने ग्रामीण युवाओं को नई आकांक्षाएं दीं. सामाजिक कल्याण हॉस्टल्स, जो कभी भर्ती का केंद्र माने जाते थे, अब उनका महत्व कम हो गया क्योंकि शिक्षा अब निजी हाथों में जाती रही. विश्व बैंक के अनुसार, राष्ट्रीय स्तर पर ग़रीबी 1977 की 59.07% की तुलना में 2022 में घटकर 5.25% रह गई.


भारत में हरित क्रांति 1960 के दशक के अंत में शुरू हुई थी, उसने देश को 1980 के दशक के अंत तक खाद्य संकट से उबारने में मदद की.


समय के साथ बौद्धिक समर्थन कम होता गया. साल 2009 में के. बालगोपाल ने लिखा: “नक्सली आंदोलन के लगभग चालीस साल बाद पीछे मुड़कर देखने पर हैरानी होती है कि महत्वपूर्ण नीतियों से जुड़े ऐसे कितने कम फैसले हैं जिन्हें नक्सली रोकने में सक्षम रहे.” मध्यम वर्ग भी दूर होता गया और लोकतंत्र में सशस्त्र संघर्ष पर कई सवाल उठाने लगे.


मुठभेड़ों को लेकर बहस, चाहे वे असली हों या फर्जी, ख़त्म हो गई. माओवादी नेताओं की मौत समाज के लिए अब कोई मुद्दा नहीं रही.

...पहचान की राजनीति और आंबेडकर....

1990 के दशक में दलित, नारीवादी और साहित्यिक आंदोलनों का उदय हुआ, जो माओवादियों से अलग राह पर चले. बी.आर.आंबेडकर को साल 1990 में भारत रत्न से सम्मानित किया गया. इसके बाद दलित बहुल इलाके जो कभी माओवादियों के गढ़ थे, वो उनसे छूटते चले गए. मंडल आयोग की रिपोर्ट और उससे जुड़े घटनाक्रम के बाद यह और तेज़ी से होता चला गया और शहरी मध्यम वर्ग में भी उनका समर्थन घटने लगा. 

बीबीसी से हालिया बातचीत में कोबाड गांधी ने नक्सल आंदोलन की शुरुआत और उसकी असफलता पर खुलकर बात की. गांधी का कहना है कि इस आंदोलन के अपने उद्देश्य को हासिल नहीं करने की वजह सिर्फ़ उसकी आंतरिक कमज़ोरियां ही नहीं थीं बल्कि स्टेट की भारी ताकत भी थी.


उन्होंने माना कि इंडियन स्टेट की ताकत तो थी ही, इसके साथ जाति व्यवस्था, सामाजिक विभाजन तथा आदिवासियों के अलग तरह के संघर्ष जैसी जटिलताएं भी आंदोलन के लिए बड़ी बाधा साबित हुई. उनके अनुसार, आंदोलन न सिर्फ़ इन परतदार हकीकत को पूरी तरह समझने में विफल रहा और बल्कि उस पर प्रभावी तरीके से काम भी नहीं कर पाया.


हालांकि वो ये मानते हैं कि इन मुद्दों पर इस आंदोलन ने अन्य राजनीतिक शक्तियों की तुलना में अधिक गंभीरता से काम किया.


उनके अनुसार, जाति के प्रश्न की अनदेखी आंदोलन की दूरदर्शिता की बुनियादी कमी थी. इस वजह ने वंचित समूहों को एकजुट कर सार्थक संघर्ष खड़ा करने की उसकी क्षमता को कमजोर कर दिया.

.....साल 2004 की शांति वार्ता और सीपीआई(माओवादी)...

साल 2004 में, पीपुल्स वार और एमसीसी का विलय होकर सीपीआई (माओवादी) का गठन हुआ. उसी साल अक्तूबर में आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री वाई.एस. राजशेखर रेड्डी ने शांति वार्ता की मेज़बानी की और माओवादी नेताओं को राज्य अतिथि के रूप में रखा. हालांकि ये वार्ता विफल रही और दोनों ही पक्षों ने एक-दूसरे पर अपने फ़ायदे के लिए लाभ उठाने का आरोप लगाया.


जैसे-जैसे माओवादी जनता का आधार खोते गए, वैसे ही उनका सामाजिक-आर्थिक एजेंडा भी सार्वजनिक विमर्श में बेमानी होता चला गया.


सरकार ने अब इसे कानून-व्यवस्था की समस्या मानना शुरू किया और 'अर्बन नक्सल' जैसे शब्द लोकप्रिय हुए और शहरी नेटवर्क को तोड़ा गया. उनके साथ सहानुभूति रखने वाले कई बुद्धिजीवी अब जेलों में हैं और कुछ गंभीर आरोपों का सामना कर रहे हैं.


.....सैन्यीकरण और पतन....

साल 2000 के बाद, सरकार के पास ड्रोन, आधुनिक हथियार और आंध्र प्रदेश की ग्रेहाउंड्स जैसी विशेष बलों के साथ तकनीकी बढ़त थी. छत्तीसगढ़ में आदिवासी नेतृत्व वाला डिस्ट्रिक्ट रिज़र्व गार्ड (डीआरजी) महत्वपूर्ण भूमिका निभाने लगा.


सलवा जुडूम (2005-2011) का उद्देश्य माओवादियों को खदेड़ना था. हालांकि, इसे सुप्रीम कोर्ट ने असंवैधानिक घोषित कर दिया. लेकिन इससे जुड़े कई सदस्य डीआरजी में भी शामिल हो गए. कल्याणकारी योजनाओं, सड़कों और आदिवासी समाज में राजनीतिक विभाजन ने माओवादी गढ़ों को कमजोर कर दिया.


साउथ एशिया टेररिज़्म पोर्टल के मुताबिक़, साल 2000 से 2025 के बीच माओवाद से जुड़ी हिंसा में 4,944 माओवादियों, 2,717 सुरक्षाकर्मियों, 4,128 नागरिकों और 252 अज्ञात लोगों सहित कुल 12,041 लोगों की मौत हुई है. 

....रोटी, कपड़ा और मकान' से लेकर 'ज़िंदगी न मिलेगी दोबारा'.....

इस आंदोलन की शुरुआत फ़िल्म ‘बंदिनी’ (1963) के युग में हुई थी, जब गरीबी सिनेमा का मुख्य विषय हुआ करती थी. ‘ज़िंदगी ना मिलेगी दोबारा’ (2011) तक आते-आते सिनेमा का मुख्य विषय मध्यम वर्ग पर केंद्रित हो गया और इसके साथ ही माओवाद भी लोगों की कल्पना से जुड़ने में असमर्थ होता चला गया.

सबसे पिछड़े क्षेत्रों तक खुद को सीमित करने के कारण नक्सली खुद को हाशिए पर लाते चले गए. बाहरी दुनिया के साथ उनका संबंध अब लगभग समाप्त सा हो गया है. जैसे-जैसे 

भारत शहरीकरण की ओर बढ़ रहा है, नक्सली सुदूर जंगलों तक सीमित रह गए.

कोबाड गांधी ने बहुत पहले स्वीकार किया था. “आज...यह ज़्यादातर सबसे पिछड़े जंगलों तक ही सीमित है. ग्रामीण मैदानों में इसकी मौजूदगी बहुत कम है, शहरों की तो बात ही छोड़ दें.”

लेनिन, माओ या नेपाल के प्रचंड की क्रांतियों में राष्ट्रवाद का रंग था लेकिन भारत के माओवादियों में देश को एकजुट करने वाला वो पुट नहीं था. लोकतंत्र में जहां कानूनी रास्ते मौजूद हैं, वहां कई लोगों ने सशस्त्र क्रांति को पुरातन सोच की तरह देखा. 

निष्कर्ष

माओ के ये आख़िरी सैनिक अब अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं. यह देखना बाकी है कि स्टेट बची हुई ताकतों को पुनः एकजुट होने देगा या पूर्णरूप से ख़ात्मे पर ही ज़ोर देगा. ‘स्प्रिंग थंडर’ से लेकर आज फीकी पड़ती गूंज तक, नक्सलवाद की कहानी भारत की बदलती राजनीतिक-आर्थिक व्यवस्था की भी उतनी ही कहानी है जितनी उन लोगों की, जिन्होंने इसे बदलने के लिए हथियार उठाए. 








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