पत्थलगांव / जानकारी के अनुसार पत्थलगांव जनपद पंचायत अंतर्गत ग्राम पंचायत घरजीयाबथान में कई वर्षों से जमे पंचायत सचिव जोगेंद्र यादव ने फर्जी तरीके से अपनी पत्नि पदमा बाई के नाम से लगभग 1 एकड़ जमीन का वन अधिकार पट्टा बनवाया । आज तक कई लोग को मेहनत मजदूरी करते हैं उन्हें भी सरकार उनके आधार पर पट्टा वितरण
करती है लेकिन अपनी पंचायत में मनमानी करते हुए ग्राम सचिव ने साठ गांठ करते हुए फर्जी तरीके से वन अधिकार पट्टा हासिल किया है । जब एक शासकीय कर्मचारी की बात करें तो आसानी से यदि वह पट्टा हासिल कर ले रहा है तो जाहिर सी बात है इसमें उच्च अधिकारियों की भी मिली भगत देखी जा सकती है क्योंकि बिना उच्च अधिकारियों के ग्राम पंचायत
सचिव को वन अधिकार पट्टा नहीं मिल सकता जबकि डॉक्यूमेंट के आधार पर प्रतिवेदन पर भी लिखा गया है कि आवेदक के पति शासकीय कर्मचारी है उसके बावजूद अधिकारियों का पट्टा प्रदान करना कहीं ना कहीं भ्रष्टाचार पर अंजाम दे रहा है । कई वर्षों से एक ही जगह डेरा जमाय यह पंचायत सचिव ने अपनी पंचायत में अपने स्वयं पत्नि के नाम से फर्जी तरीके से पट्टा हासिल किया , क्या शासकीय कर्मचारियों को वन अधिकार पट्टा मिल सकता है और मिल भी सकता है तो किन शर्तों पर ? इस बात का पंचायत सचिव पर अधिकारियों ने जानना जरूरी नहीं समझा और वन अधिकार पट्टा पंचायत सचिव जोगेंद्र के नाम पर डाला । क्या शासन पंचायत सचिव के साथ उच्च अधिकारियों पर भी कार्रवाई करेगी यह अब देखने वाली बात होगी ।
जानकारी के अनुसार
1. पहली बात तो ये कि वन अधिकार पट्टा *अन्य पिछड़ा वर्ग* को मिलने का प्रावधान तभी है जब आवेदक के पूर्वज 3 पीढ़ी से छोटे बड़े झाड़ के जंगल मे खेती कर जीवन यापन कर रहे हों.. जबकि यहाँ आवेदिका पदमा बाई का कोई पूर्वज तीन पीढ़ी से खेती नहीं कर रहा था । उनके पति जोगेंद्र जो कि एक शासकीय कर्मचारी पंचायत सचिव हैँ, तथा प्रकरण मे साफ एक जगह 30 वर्ष तथा एक जगह 25 वर्ष पूर्व का कब्जा आवेदिका का होना बताया गया है....
2. एक शासकीय कर्मचारी होने के बावजूद जोगेंद्र ने खुद के नाम पे पट्टा बनने पर अप्पत्ती हो सकती है ये ध्यान मे रख कर अपनी पत्नी पदमा बाई के नाम पर पट्टा बनवाया है । क्या कोई शासकीय कर्मचारी अपने नाम या अपनी पत्नी के नाम पर वन अधिकार पट्टा बनवा सकता है ये तो जाँच का विषय है ।
3. वन अधिकार के लिए ग्राम सभा का प्रस्ताव तथा वहां बैठे पंचो के समक्ष कार्यवाही की नक़ल जरुरी होती है। बैठक कार्यवाही की नक़ल देखने से साफ प्रतीत होता है कि, आख़री लाइन खत्म होने के बाद आवेदिका तथा उनके पति जोगेंद्र को अनुचित लाभ पहुँचाने के लिए, तत्कालीन सचिव तथा सरपंच मिली भगत करके रजिस्टर मे आखरी मे पदमा बाई का नाम जोड़ दिए हैँ ।
4. मजे कि बात तो यह है कि तत्कालीन सचिव । जिनका सिग्नेचर वन अधिकार से लेकर पंचायत प्रस्ताव तथा हर पेज मे हैँ वो कोई और नहीं खुद *आवेदिका पदमा बाई* के पति जोगेंद्र हैँ...




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