रायगढ़, केंद्र और राज्य सरकार के संयुक्त प्रयासों से राज्यों में गरीबी रेखा का सर्वे इस नियति से कराया गया ताकि राज्य में कोई भी व्यक्ति भोजन के बगैर अपने प्राण न गवा सके। और सरकार इस योजना के तहत सर्वे कराकर गरीबों को₹1 किलो या ₹2 किलो या कहीं मुफ्त में चावल एवं अन्य खाद्य सामग्री मुहैया करा रही है । कहीं-कहीं मिट्टी तेल का भी
वितरण जारी है। सरकार योजना तो बना लेती है और उस पर निगरानी रखने के लिए अधिकारियों और कर्मचारियों की फौज भी खड़ी कर देती है , किंतु बाद में यह सारी योजना निगरानी मुक्त हो जाती है और राज्य एवं केंद्र पर आकारन हीं सामग्री के साथ-साथ अधिकारियों और कर्मचारियों का बोझ बढ़ जाता है। और अधिकारियों और कर्मचारियों के लिए एक नया रास्ता खुल जाता है और वह है भ्रष्टाचार का रास्ता। इसलिए सरकार को चाहिए की योजनाओं के लागू करने के बाद उस पर निगरानी भी उतनी ही शिद्दत से की जाए, जितनी शिद्दत से उन्होंने योजनाओं को प्रारंभ किया। आज जरूरत बीपीएल कार्डों के जांच की नहीं बल्कि अनुसंधान की है, और यदि सरकार बीपीएल कार्डों का अनुसंधान (एकदम सूक्ष्मता से जांच) करवाती है, तो मेरा अनुमान है कि यदि हम एक राज्य अपने केवल छत्तीसगढ़ का अनुसंधान करवाये तो कुल जारी बी पी एल कार्ड में से 15% ही पात्र उपभोक्ता रहेंगे। 85% उपभोक्ता स्वत ही बाहर हो जाएंगे। क्योंकि सरकार बीपीएल कार्ड धारकों के लिए जो पैरामीटर तय किया है, लगभग 80 से 85% लोग उस पैरामीटर में सही बैठते ही नहीं है, किंतु व्यक्तिगत संबंधों एवं राजनीतिक लालसा क्योंकि राजनीतिक लालसा का ही परिणाम है कि अपात्र लोगों को भी इसमें जोड़कर अपना उल्लू सीधा करते रहते हैं। जिसका भार सरकारी खजाने पर पड़ता है।
आज के समय में यदि सरकार हिसाब लगाए तो सरकार को प्रति किलो चावल की कुल लागत 76 रुपए से 84 रुपए के बीच में पड़ती है। इसके अतिरिक्त सरकारी अधिकारी , कर्मचारी उनके वाहन व्यवस्था के साथ-साथ खाद्य विभाग के जिला कार्यालय से मंत्रालय तक का स्टेशनरी आदि , यदि हिसाब लगाया जाए तो दिमाग का दही होना तय है । और उसके बाद लगभग 80% अपात्र लोग जो मोटरसाइकिल और कार से सरकारी राशन दुकान तक जाते हैं और गरीबी रेखा का चावल गाड़ी में लोड करके लाते हैं। यदि 80% पर अंकुश लगा दिया जाता है तो सोचिए सरकार के खजाने में कितना पैसा बचेगा। इतना ही नहीं , शेष बचे गरीबी रेखा कार्ड धारी और एपीएल कार्ड धारी जिनको 76 से 84 रुपए प्रति किलो की लागत वाली मोटी चावल वितरित की जाती है, यदि उसके स्थान पर उन्हें 40 से ₹50 प्रति किलो के हिसाब से सीधे उनके बैंक खाते में डाल दिया जाए तो वह मार्केट से इससे भी अच्छी क्वालिटी का चावल लेकर खा पाएंगे । और सबसे बड़ी बात तो यह है कि जिन गरीबों को चावल मिलते भी है , उनमें से कई परिवारों के चावल यूं ही उनके परिजनों के द्वारा बेच दिए जाते हैं और उसे शराब आदि पीने में उपयोग में लाते हैं, इसके जगह जो की कार्ड महिलाओं के नाम पर है, यदि पैसा सीधे महिलाओं के खाते में चला जाएगा तो उसका उपयोग महिलाएं उचित तरीके से कर सकती हैं।
अब देखना यह है कि सरकार अपनी पुरानी लकीरों पर ही चलना पसंद करती है या मेरे इस अपील का सरकार में बैठे शासन और प्रशासन में बैठे कुछ उच्च अधिकारियों के दिलों दिमाग पर कुछ असर डालती है या नहीं । और वर्तमान में चल रही भर्राशाही को शासन श्राप के रूप में ही स्वीकार करती रहेगी या इसे उचित लोगों और उचित तरीके से लागू कर सरकार और हितग्राहियों के लिए वरदान का रूप देगी । क्योंकि
*परिवर्तन ही प्रकृति का नियम है*।


0 Comments